समस्त प्रकार की बाधाओं के संहार में सहायक अति तीव्र मन्त्र:- ॥ऊं भ्रं काल भैरवाय फ़ट॥
Thursday, October 20, 2011
जल्दी बुखार उतारने का यंत्र
परीक्षा में सफलता दिलाने वाला यंत्र
Wednesday, August 24, 2011
भागो मत, सामना करने से दूर होगा भय
भैरव तंत्र के अनुसार किसी चीज का अतिक्रमण उसी चीज के माध्यम से संभव है। उदाहरण के लिए, भय है तो भय से भागकर या बचकर नहीं भय का सामना करने से ही भय का निवारण हो पाएगा। माँस, मदिरा, मत्स्य, काम की चाह जल्दी भरमाते हैं। इनसे से बचना है तो इनका अतिक्रमण करना होगा। बीच से गुजर कर जाना होगा। जब आप इन्हें देख लेंगे, इन्हें जान लेंगे तो फिर ये आपको भरमा नहीं पायेंगे। ये आकर्षण इसीलिये भरम पैदा करते हैं कि लोग सोये सोये ही इनमें उलझे रहते हैं। जिस दिन जागकर इन्हें जान लिया उसी दिन से इन आकर्षणों का अर्थ समाप्त हो जाता है। ये आकर्षण अर्थहीन हो जाते हैं। ये आकर्षित करना छोड़ देते हैं। भैरव तंत्र ने अनेक उपाय सुझाये हैं। ये सारे उपाय बाजार की उन्हीं गलियों से गुजरते हैं जहाँ आपका आपा खो गया था। उदाहरण के लिए कुछ रास्तों के नाम हैं – मायीव प्रयोग (फ़िल्म, जादू के करतब, तमाशा आदि), भोजन, पान, मित्र – मिलाप, प्रेम – प्रसंग, गाड़ी की सवारी, संगीत सुनते समय आदि। भैरव तंत्र कहता है कि ये ही रास्ते आपको भैरवी अवस्था तक पहुँचा सकते हैं जहाँ पातँजलि आपको अष्टाँग योग से ले जाना चाहते हैं। भैरव तंत्र के रास्ते से लाभ यह होगा कि आपको बाजार भी नहीं त्यागना पड़ेगा और आप बाजार में योग की दुकान सजाये बैठे आढ़तियों से भी बच जाएँगे।
भैरव तंत्र के प्रारम्भ में ही देवी शिव से पूछती हैं- हे शिव, आपका सत्य क्या है? यह विस्मय भरा विश्व क्या है? इसका बीज क्या है? विश्व चक्र की धुरी क्या है? रूपों पर छाए लेकिन रूप के परे जाकर हम इसमें कैसे पूर्णतः प्रवेश करें? मेरे संशय निर्मूल करें। इसके उत्तर में शिव ने देवी के समक्ष 112 विधियों का उल्लेख किया है जिनके माध्यम से भैरवी अवस्था को प्राप्त हुआ जा सकता है। इन 112 विधियों की चर्चा से पूर्व भैरवी अवस्था को समझना श्रेयस्कर होगा। विज्ञान भैरव की14 वीं,15 और 19 वीं कारिकाओं में शिव कहते हैं –
दिक्कालकलनोन्मुक्ता देशोद्देशाविशेषिणी।
व्युपदेष्टुमशक्यासावकथ्या परमार्थतः।।14।।
अन्तः स्वानुभवानन्दा विकल्पोन्मुक्त गोचरा।
यावस्था भरिताकारा भैरवी भैरवात्मनः।।15।।
न वह्नेर्दाहिका शक्तिव् र्यतिरिक्ता विभाव्यते।
केवलं ज्ञानसत्तायां प्रारम्भोदयं प्रवेशने।।19।।
अर्थात दिशा और काल के व्यापार से मुक्त, दूर या समीप के भेद से रहित, प्रतिपादन के अयोग्य यह तत्त्वतः अनिर्वचनीय है। वास्तव में भीतर ही भीतर अपने अनुभव मात्र से आनन्द देने वाली और संकल्प विकल्प से मुक्त होकर अनुभूत होने वाली जो परिपूर्ण आकार वाली अवस्था है वही भैरवी शक्ति है। अग्नि की दाह्य शक्ति अग्नि से अलग कुछ नहीं है। ज्ञान प्रारम्भ करने के लिए प्रवेश द्वार के रूप तक तो ठीक है। शिव यहाँ अस्तित्त्व और ज्ञान के द्वैत को समझा रहे हैं। उनके अनुसार ज्ञान और अस्तित्त्व अनिवार्यतः एक ही नहीं हैं। ज्ञान एक कामचलाऊ अवधारणा भर है। ज्ञान मात्र से अस्तित्त्व के बारे में दिया गया वक्तव्य बहुत प्रमाणिक नहीं हो सकता है। विषय में प्रवेश करवा देने के बाद ज्ञान का मूल्य रद्दी के गट्ठर से अधिक शायद ही रह पाता हो। 32 वीं कारिका कहती हैः
शिखिपक्षैश्चित्ररूपैर्मण्डलैः शून्यपंचकम्।
ध्यायतोनुत्तरे शून्ये प्रवेशो हृदये भवेत्।।32।।
रंगीन मोरपंखों की तरह मण्डलों (इन्द्रियों या तन्मात्राओं) को पंचक शून्य मानकर हृदय में ध्यान करते हुए (योगी) का प्रवेश अनुत्तर शून्य में होता है। मोर पंखों में रंगीन वर्तुल होते हैं। मोहक होते हैं। मनभावन होते हैं। आपकी पाँच इन्द्रियाँ ( आँख, नाक, कान, रसना और त्वचा) हैं और इन पाँच इन्द्रियों से सम्बन्धित पाँच तन्मात्राएँ ( रूप, गंध, शब्द, रस और स्पर्श ) हैं। इनमें ही स्थित हो जाओ। इनसे भागो मत। इनमें स्थित हो जाओ। इन से भाग कर आप जा नहीं पाएँगे। इनसे भागने का कोई उपाय नहीं है। जहाँ भी भाग कर जाओगे आपके आँख, नाक, कान, जीभ और खाल वहीं वहीं चली जाएगी। आप इन इन्द्रियों के बिना भाग ना पाओगे। ये आपके अटूट हिस्से हैं। इनमें स्थित हो जाओ। इन्हीं में विसर्जित हो जाओ। शिव कहते हैं – ऐसे नहीं। आप खा रहे हैं। हाथ, जबड़ा, जीभ, कान, मस्तिष्क सब चल रहे हैं। भोजन किया जा रहा है। आपकी इन्द्रियाँ गतिशील हैं परन्तु आप किसी भी इन्द्रिय की गति में उपस्थित नहीं हैं। मुँह, आँख, कान, मस्तिष्क चलाने वाला सोया हुआ है। इन्द्रियाँ आपके अस्तित्त्व का हिस्सा हैं। जब देखो तो देखना बन जाओ। सुनो तो सुनना बन जाओ। जागकर देखो कि देखा जा रहा है। जागकर सुनो कि सुना जा रहा है। जाग कर सूँघो कि सूँघा जा रहा है। शिव जागरण का आह्वान कर रहे हैं। शिव कहते हैं- जागकर अपनी इन्द्रियों के मण्डल में खो जाओ। सोते हुए मत देखो। सोते हुए मत सुनो। सोते हुए देखोगे तो दृश्य तो रहेगा पर दर्शक का स्थान खो जाएगा। दर्शक के होने का कोई उपाय न बचेगा। शिव कहते दृश्य यन्त्रवत् है, दर्शक नहीं। दर्शक चेतन हैं। शिव दर्शक को जगाते हैं। शिव चैतन्य की बात करते हैं। रंगीन मोरपंखों की तरह मण्डलों (इन्द्रियों या तन्मात्राओं) को पंचक शून्य मानो। मोर पंखों की तरह इन पंचेन्द्रियों या पंच तन्मात्राओं को शून्य मानो। आरोपण मत करो। आरोपण से दृश्य शुद्ध नहीं रह पाएगा। आरोपण एक बाधा है। यह कृत्रिम है। यह दृश्य की सही संवेदना को दर्शक तक पहुँचने से रोकती है। जो संवेदना विषय से चलनी शुरु हुई थी वह जस की तस चित्त तक नहीं पहुँची। पुराने अनुभवों के आरोप ने उसे मैला कर दिया। दर्शक को जो दृश्य उपस्थित हो सकता था पिछले अनुभवों के आरोप ने उसे उस दृश्य से वंचित कर दिया। अब इसके बाद हृदय में ध्यान करने से योगी शून्य में प्रवेश करता है। हृदय में ध्यान की विशिष्टता है। भ्रूमध्य में नहीं, मूलाधार में नहीं, मध्यनाड़ी में नहीं, शिव कहते हैं – हृदय में ध्यान करने से योगी शून्य में प्रवेश करता है। इससे पूर्व में 24 वीं कारिका में शिव कहते हैं कि हृदय से द्वादशांत तक चलने वाली ऊर्ध्व वायु प्राण है और द्वादशाँत से हृदय तक चलने वाली अधो वायु अपान है। शिव कहते हैं कि हृदय प्राण की उत्पत्ति का स्थान है। यहाँ प्राण और अपान का मिलन होता है। हृदय अस्तित्त्व का आधार स्थान है। हृदय में ध्यान करने से योगी शून्य में प्रवेश करता है। मस्तिष्क बुद्धि का उपकरण है। मस्तिष्क सोचने विचारने की टूल किट है। बुद्धि सोचने और विचारने के बाद संकल्प और विकल्प सुझा देती है। बुद्धि विकल्पात्मिका है। योगी शून्य में प्रवेश करता है। नागसेन बहुत बड़े बौद्ध आचार्य हुए हैं। एक बार राजा मिलिन्द ने उनसे पूछा था – भन्ते कुछ लोग कहते हैं कि संसार है, कुछ अन्य लोग कहते हैं कि संसार नहीं है बस प्रतीति है। कुछ लोग कहते हैं कि संसार ऐसा है तो अन्य लोग संसार को कुछ अन्य तरह का बताते हैं। ऐसी ही बातें आत्मा, ईश्वर आदि के बारे में भी कही जाती हैं। भगवन कृपया मेरी शंका का निवारण करें। मुझे इनका स्वरूप बतायें । नागसेन ने कहा – राजन् , संसार का अस्तित्त्व है – ऐसा कहना नितांत सही नहीं होगा। क्योंकि अगर संसार का अस्तित्त्व है तो मृत्यु जैसी अनस्तित्त्वमूलक घटनाओं का कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया जा सकता है। जिसका अस्तित्त्व है उसका अनस्तित्त्व नहीं हो सकता। राजन ऐसा भी नहीं कहा जा सकता कि संसार का कोई अस्तित्त्व नहीं है। नियमित रूप से जन्म आदि घटनाएँ देखने में आती हैं। अनस्तित्त्वमान संसार का नियमित रूप से अस्तित्त्व में आते रहने को समझाया नहीं जा सकता है। साथ ही ऐसा भी कहना युक्तिसंगत नहीं है कि यह अनस्तित्त्वमान सत्ताओं का अस्तित्त्व है या अस्तित्त्वमान सत्ताओं का अनस्तित्त्व है। अन्तिम दोनों स्थितियाँ स्वतः व्याघाती (self contradictory) हैं। तब राजा मिलिन्द ने फिर पूछा कि प्रभु तब यह सब क्या है. नागसेन ने कहा- राजन यह अनिर्वचनीय है। इसे बोलकर नहीं बताया जा सकता है। आप संसार से कट कर कहीं नहीं जा सकते। संसार से कटना कोई मार्ग है भी नहीं। यहीं मुक्त हो जाओ। मोक्ष पा जाओ। कन्दराओं में मोक्ष होता तो वहाँ की शिलाँए पहले ही मोक्ष पा चुकी होतीं। आपके जाने के लिए स्थान न बचता। मोक्ष कन्दराओं में नहीं छिपा है। मोक्ष आपमें ही छिपा है। अपितु आप ही मोक्ष हैं। बिलकुल वैसे ही जैसे की आप ही बन्धन भी हैं। मोक्ष बाहर से आयातित कोई वस्तु नहीं है। आपकी जागृति ही है। जाग जाओ, यह जरूरी है।
Monday, May 23, 2011
क्या है पितृ दोष और उसका निवारण
जन्म कुण्डली का नौवां घर धर्म का घर कहा जाता है। यही पिता का घर भी होता है। यदि किसी प्रकार से यह नवां घर खराब ग्रहों से ग्रसित हो जाए तो यह सूचना है कि पूर्वजों की इच्छाएं अधूरी रह गयी थीं। सूर्य, मंगल और शनि प्राकृतिक रूप से खराब ग्रह कहे जाते है और कुछ लग्नों में अपना काम करते हैं लेकिन राहु और केतु सभी लग्नों में अपना दुष्प्रभाव देते हैं। ज्योतिषविदों के मुताबिक, नवां भाव, नवें भाव का मालिक ग्रह, नवां भाव चन्द्र राशि से और चन्द्र राशि से नवें भाव का मालिक अगर राहु या केतु से ग्रसित है तो यह पितृ दोष कहा जाता है। इस प्रकार का जातक हमेशा किसी न किसी प्रकार के तनाव में रहता है और उसकी शिक्षा पूरी नहीं हो पाती।वह जीविका के लिए तरसता रहता है,वह किसी न किसी प्रकार से दिमागी या शारीरिक रूप से अपंग होता है। यदि किसी भी तरह से नवां भाव या नवें भाव का मालिक राहु या केतु से ग्रसित है तो यह सौ प्रतिशत पितृदोष के कारणों में आ जाता है। पितृ दोष किसी भी प्रकार की सिद्धि को नहीं आने देता है। सफ़लता कोसों दूर रहती है और व्यक्ति केवल भटकाव की तरफ़ ही जाता रहता है। लेकिन अगर कोई व्यक्ति माता काली का उपासक है तो किसी भी प्रकार का दोष उसके जीवन से दूर रहता है। व्यक्ति की अनदेखी या अधिक आधुनिकता के प्रभाव के कारण समय से अर्पण न करने पर जो पितृ पिशाच योनि मे चले जाते हैं और दुखी रहते हैं। पितृ दोष हर व्यक्ति को परेशान कर सकता है इसलिये निवारण बहुत जरूरी है।पितृदोष को दूर करने का एक बढ़िया उपाय एक बार की ही पूजा है। यह पूजा किसी भी प्रकार के पितृदोष को दूर करती है। सोमवती अमावस्या को (जिस अमावस्या को सोमवार हो) पास ही स्थित किसी पीपल के पेड़ के पास जाइये और उस पेड़ को एक जनेऊ दीजिये और एक जनेऊ भगवान विष्णु के नाम का उसी पीपल को दीजिये। पीपल के पेड़ और भगवान विष्णु की प्रार्थना कीजिये, फिर उस पीपल के पेड़ की एक सौ आठ परिक्रमा दीजिये। हर परिक्रमा के बाद एक मिठाई (जो भी आपके स्वच्छ रूप से हो) पीपल को अर्पित कीजिये। परिक्रमा करते वक्त :ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय" मंत्र का जाप करते जाइये। परिक्रमा पूरी करने के बाद फ़िर से पीपल के पेड़ और भगवान विष्णु की प्रार्थना कीजिये। उनसे जाने-अनजाने में हुए अपराधों के लिए क्षमा मांग लीजिए। सोमवती अमावस्या की पूजा से बहुत जल्दी ही उत्तम फ़लों की प्राप्ति होने लगती है। दूसरा उपाय है, जिसके तहत कौओं और मछलियों को चावल और घी मिलाकर बनाए गए लड्डू हर शनिवार को दीजिए।
आने वाली सोमवती अमावस्यायें :-25th August 2014, 22nd December 2014
Thursday, March 31, 2011
सपनों की समस्या के हल
नींद में अधिकांश लोगों को सपने आते हैं। सपने भी अलग-अलग प्रकार के होते हैं। सपनों की दुनिया पूरी तरह अवास्तविक होती है, पर हां सपने हमारे भविष्य के संबंध में कुछ संकेत अवश्य करते हैं। सपने का ज्योतिष शास्त्र काफी गहरे अर्थ बताए गए हैं। अच्छे सपने आते हैं तब तो ठीक हैं परंतु कई लोगों को डरवाने और बुरे सपने आते हैं जिससे वे कई बार चौंककर उठ जाते हैं। कोई सपने में देखता है कि किसी से उसकी जान को खतरा है, कोई भूत-प्रेत आदि देखता है। अधिकांश सपने हमारे दिमाग की ही उपज होते हैं। जागते समय जो हम देखते है, करते हैं, सुनते हैं वह कहीं ना कहीं हमारे दिमाग में कैद हो जाता है। रात में सोने के बाद दिमाग में सारी बातें सपनों को जन्म देती हैं। बुरे सपने की समस्या से कोई इस तरह पीछा छुड़ा सकता है-:- जागते समय अधिक ना सोचे। ज्यादा कल्पानाएं ना करें।
- दिनभर बुरे खयालों से खुद को बचाएं।
- ऐसी फिल्में ना देखें जो डरावनी हो।
- ऐसा साहित्य ना पढ़ें जिसमें भूत-प्रेत आदि के किस्से-कहानी हों।
- दोस्तों से गप्पे मारते समय भूत-प्रेत या अन्य बुराई वाली या डरावनी बातें ना करें।
- हमेशा पॉजीटिव सोच रखें। कभी नेगेटिव विचार मन में न लाएं।
- क्रोध पर विराम लगाएं, कोशिश करें कि क्रोधित कम से कम हो।
- सुबह उठने के बाद ध्यान और योगा आदि अवश्य करें।
- सोने से पूर्व भगवान का स्मरण अवश्य करें। हो सके तो अपने इष्टदेव की प्रार्थना करके ही सोएं।
- धर्म शास्त्र पढऩे में रूचि जगाएं।
- एकदम अंधेरे कमरे में ना सोएं। कमरे में हो सके तो पीली रोशनी का प्रबंध अवश्य करें।
- यदि सपने सांप दिखाई देते हैं तो संभव है आपकी कुंडली में कालसर्प दोष हो। अत: इस संबंध में किसी ज्योतिषी से संपर्क करें।
- अपने तकिए के नीचे चाकू रख कर सोएं।
- मंगलवार को हनुमानजी की विशेष पूजा आराधना करें।
- दिन में सोने से बचें।
-यदि सपने सांप दिखाई देते हैं तो संभव है आपकी कुंडली में कालसर्प दोष हो। इस संबंध में किसी ज्योतिषी से संपर्क करें।
आयुर्वेद में इसकी विस्तार से चर्चा
दु:स्वप्न या मृत प्राणियों को सपने में देखना कोई नई बात नहीं है। आयुर्वेद में इसकी विस्तार से चर्चा है। वात असंतुलन को इसका कारण माना गया है और वात को संतुलित करने वाली जीवन शैली को अपनाना इसका इलाज माना गया है। प्राणायाम, सम्मोहन, काउंसलिंग, ध्यान, योग, जलनेति और नियमित रूप से कसरत वगैरह से दु:स्वप्न के शिकार लोगों को काफी मदद मिलती है। हनुमान चालीसा में 1 दोहा है: भूत पिशाच निकट नहीं आवे...। मिथकीय संदर्भ में देखें तो हनुमान को ऐसे रूप में दर्शाया गया है जिसे प्राणायाम और उससे जुड़ी दूसरी सिद्धियों पर अधिकार प्राप्त है। दोहे का मूल अर्थ यह है कि प्राणायाम आदि से खुद को जोड़ कर इन व्याधियों से मुक्ति पाई जा सकती है। फिर भी तंत्र विज्ञान में कुछ उपाय हैं, जिनसे लाभ मिलने का दावा किया जाता रहा है-
- घर में भूत प्रेत की बाधा हो, अथवा बच्चों पे भूत प्रेत की हवा लग जाती है तो उस भूत को और बाधा को मिटाने के लिए होली का उत्सव के दूसरे दिन (धुलेंडी) को होली की राख घर में रख दें। जिस बच्चे को ऊपर की हवा का डर हो उस की नाभि में और ललाट पर तिलक करो, तो भूत प्रेत का प्रभाव भी गायब हो जायेगा।
होम्योपैथी में उपचार-
१) सपने में गन्दा पानी देखे ......आर्निका
२) कुत्ते बिल्ली दिखे सपने में ......ओपियम और आर्निका
३) आग और पानी के सपने देखे ......नेट्रम म्यूर
४) भूत -प्रेत , लाशें देखे .......थूजा, औरम मेट
५) भूकंप के सपने देखे ...... लेक फेल (lac fell)
६) परिया (angels ) देखे ......स्ट्रामोनियम
७) पानी पीने के सपने देखे .....ड्रोसेरा
८) खुद की मौत देखे ....चिनिअम आर्स
९) सपने में ऐसा लगे जैसे कोई गला घोंट रहा हो ....सेबेडिला और स्पयिजेलिया
10) सफ़र करने के सपने देखे .....एपिस मेलिफिका
११) सोते से जाग जाए और फिर से वही सपना देखने लगे जो पहले से देख रहा था .....सोरिनम
१२) गाय कुत्ते देखे ....बेलाडोना
१३) सारी रात सपने देखे ....पयरोजिनम
१४) सपने में लड़ाई देखे ....आर्सेनिकम एल्बम
१५) ऊचाई से गिरने के सपने .....एडोनिस वर
Tuesday, March 29, 2011
घर-कारोबार में वास्तु संबंधी टोने-टोटके
* भवन के उत्तर में द्वार व खिड़कियाँ रखने से धनागमन होता है।* भूखण्ड के उत्तर पूर्व में अण्डरग्राउण्ड पानी का टैंक रखने से स्थिर व्यवसाय एवं लक्ष्मी का वास होता है।
* उत्तर पूर्व के अण्डरग्राउण्ड टैंक से रोजाना पानी निकाल कर पेड़ पौधे सीचने से धन वृद्धि होती है।
* भवन के उत्तर पूर्व का फर्श सबसे नीचा होना चाहिए तथा दक्षिण पश्चिम का फर्श सबसे ऊंचा रखने से आय अधिक, व्यय कम रहता है।
* भूखण्ड के उत्तर में चमेली के तेल का दीपक जलाने से धन लाभ होता है।
* भवन के मुख्यद्वार को सबसे बड़ा रखना चाहिए यह सबसे सुंदर भी होना चाहिए। मुख्यद्वार के ऊपर गणेश जी बैठाने से घर में सभी प्रकार की सुख सुविधा रहती है।
* घर में यदि पांजिटिव ऊर्जा नहीं हो तो रोजाना नमक युक्त पानी का पौंछा लगाना चाहिए। भूखण्ड के उत्तर पूर्व में साबुत नमक की डली रखने से भी घर में पांजिटिव ऊर्जा का संचालन होता है। इसे 4-5 दिन में बदलते रहना चाहिए।
* घर के तीनों भाग व्याव्य, ईशान और उत्तर खुला रखने से तथा भूखण्ड की ढलान उत्तर पूर्व एवं पूर्व की ओर रखने से लक्ष्मी अपने आप बढती है। धन की कमी नहीं रहती है।
* भूखण्ड या भवन के उत्तर पूर्व में शीशे की बोतल में जल भरकर रखने से तथा इस जल का सेवन एक दिन पश्चात करने से घर वालों का स्वस्थ सही रहता है।
* सुबह एवं शाम सम्पूर्ण घर में कपूर का धुंआ लगाने से वास्तु दोषों में कमी आती है।
* भवन में दक्षिण-पश्चिम की दीवार मजबूत रखने से आर्थिक पश्चिम स्थिति मजबूत रहती है।
* भवन का दक्षिण पश्चिम भाग ऊंचा रखने से यश एवं प्रसिधी मिलती है।
* भवन का मध्य भाग खुला रखने से परिवार में सभी सदस्य मेल जोल से रहते हैं।
* आरोग्यता और धन लाभ के लिये चारदीवारी की दक्षिणी एवं पश्चिमी दीवार उत्तर एवं पूर्व से ऊंची एवं मजबूत रखें।
* अपने ड्राइंग रूम के उत्तरी पूर्व में फिश एक्वेरियम रखें। ऐसा करने से धन लाभ होता है।
* घर के मुख्यद्वार के दोनों ओर पत्थर या धातु का एक-एक हाथी रखने से सौभाग्य में वृद्धि होती है।
* भवन में आपके नाम की प्लेट (नेम प्लेट) को बड़ी एवं चमकती हुई रखने से यश की वृद्धि होती है।
* स्वर्गीय परिजनों के चित्र दक्षिणी दीवार पर लगाने से उनका आशीर्वाद मिलता रहता है।
* विवाह योग्य कन्या को उत्तर-पश्चिम के कमरे में सुलाने से विवाह शीघ्र होता है।
*किसी भी दुकान या कार्यालय के सामने वाले द्वार पर एक काले कपडे में फिटकरी बांधकर लटकाने से बरकत होती है। धंधा अच्छा चलता है।
* दुकान के मुख्य द्वार के बीचों बीच नीबूं व हरी मिर्च लटकाने से नजर नहीं लगती है।
* घर में स्वस्तिक का निशाँ बनाने से निगेटिव ऊर्जा का क्षय होता है।
* किसी भी भवन में प्रातः एवं सायंकाल को शंख बजाने से ऋणायनों में कमी होती है।
* घर के उत्तर पूर्व में गंगा जल रखने से घर में सुख सम्पन्नता आती है।
* पीपल की पूजा करने से श्री तथा यश की वृद्धि होती है। इसका स्पर्श मात्रा से शरीर में रोग प्रतिरोधक तत्वों की वृद्धि होती है।
* घर में नित्य गोमूत्र का छिडकाव करने से सभी प्रकार के वास्तु दोषों से छुटकारा मिल जाता है।
* मुख्य द्वार में आम, पीपल, अशोक के पत्तों का बंदनवार लगाने से वंशवृद्धि होती है।
व्यवसाय में समस्याओं और श्रीवृद्धि के उपाय
* कारोबारी सफलता के लिए प्रत्येक अमावस्या के दिन अपने पूरे घर की सुंदर सफाई करें। तत्पश्चात परिवार के सभी सदस्य नहा धोकर शुद्ध वस्त्र धारण करके एक जगह एकत्रित होकर अपने बीच में चौकी रखकर उस पर लाल वस्त्र बिछा दें। वस्त्र के ऊपर 11 मुट्ठी मसूर की दाने रखकर उसके ऊपर एक चौमुखा दीपक प्रज्ज्वलित कर रख दें। तत्पश्चात घर के सभी सदस्य सुंदर काण्ड का पाठ करें। संपूर्ण कष्टों से छुटकारा मिलेगा।* नया कारोबार, नई दुकान या कोई भी नया कार्य करने से पूर्व मिट्टी के पांच पात्र लें जिसमें सवाकिलो सामान आ जाएं। प्रत्येक पात्र में सवा किलो सफेद तिल, सवा किलो पीली सरसों, सवा किलो उड़द, सवा किलो जौ, सवा किलो साबुत मूंग भर दें। मिट्टी के ढक्कन से ढंक कर सभी पात्र को लाल कपड़े से मुंह बांध दें और अपने व्यवसायकि स्थल पर इन पांचों कलश को रख दें। वर्ष भर यह कलश अपनी दुकान में रखें ग्राहकों का आगमन बड़ी सरलता से बढ़ेगा और कारोबारी समस्या का निवारण भी होगा। एक वर्ष के बाद इन संपूर्ण पात्रों को अपने ऊपर से 11 बार उसार कर बहते पानी में प्रवाह कर दें। और नये पात्र भरकर रख दें।
* यदि आपको अपने कार्य में अनावश्यक समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। बार-बार कार्य में रूकावट आ रही हो तो आप अपने घर में शनिवार के दिन तुलसी का पौधा लगाएं और हर रोज सुबह-शाम घी का दीपक जलाने से कार्य में बार-बार आने वाली समस्या का निवारण बड़ी सरलता से हो जाएगा।
* अगर कारोबार में अनावश्यक परेशानी आ रही हो, लाभ मार्ग अवरोध हो रहा हो तो हर रोज शाम को गोधूलि वेला में यानि साढ़े पांच से छ: बजे के बीच में अपने पूजा स्थान में श्री महालक्ष्मी की तस्वीर स्थापित करके या तुलसी के पौधे के सामने में गो घृत का दीपक जलाएं। दीपक प्रज्ज्वलित करने के बाद उसक अंदर अपने इष्ट देव का ध्यान करते हुए एक इलायची डाल दें। ऐसा नियमित 186 दिन करने से व्यापार में लाभ होगा। दीपक और इलायची हमेशा नया प्रयोग में लाएं।
* कारोबार में समस्या आ रही हो, व्यवसाय चल नहीं रहा हो और कर्ज से परेशान हो रहे हो तो इस प्रयोग को करके देखें। यह प्रयोग किसी भी महीने शुक्ल पक्ष के प्रथम गुरुवार के दिन शुरू करें और नियमित 186 दिन करें। हर रोज स्नानोपरांत पीपल, बरगद या तुलसी के पेड़ के नीचे चौमुखा देसी घी का दीपक जलाएं। और शुद्ध कंबल का आसन बिछाकर एक पाठ विष्णु सहस्रनाम का करें तथा 11 माला ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नम: मंत्र की जाप करें। मां लक्ष्मी की कृपा होगी और कारोबारी समस्या का निवारण हो जाएगा।
* यदि आपके व्यवसाय में बाधाएं चल रही हों तो आपको अपने कार्यस्थल पर पीले रंग की वस्तुओं का प्रयोग करना चाहिए तथा पूजाघर में हल्दी की माला लटकानी चाहिए। भगवान लक्ष्मी-नारायण के मंदिर में लड्डू का भोग लगाना चाहिए।
* व्यवसाय में मनोनुकूल लाभ की प्राप्ति नहीं हो रही हो तो किसी भी शनिवार के दिन नीले कपड़े 21 दानें रक्त गुंजा के बांधकर तिजोरी में रख दें। हर रोज धूप, दीप अवश्य दिखाएं। अपने इष्टदेव का ध्यान करें। ऐसा नियमित करने से व्यापार में लाभ मिलेगा और सफलता भी प्राप्त होगी।
* कारोबारी, पारिवारिक, कानूनी परेशानियों से छुटकारा दिलाने वाला अमोध प्रयोग
आप अपना काम कर रहे हो कठिन परिश्रम के बावजूद भी लोग आपका हक मार देते हैं। अनावश्यक कार्य अवरोध उत्पन्न करते हों। आपकी गलती न होने के बावजूद भी आपको हानि पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा हो तो यह प्रयोग आपके लिए बहुत ही लाभदायक सिध्द होगा। रात्रि में 10 बजे से 12 बजे के बीज में यह उपाय करना बहुत ही शुभ रहेगा। एक चौकी के ऊपर लाल कपड़ा बिछा कर उसके ऊपर 11 जटा वाले नारियल। प्रत्येक नारियल के ऊपर लाल कपड़ा लपेट कर कलावा बांध दें। इन सभी नारियल को चौकी के ऊपर रख दें। घी का दीपक जला करके धूप-दीप नेवैद्य पुष्प और अक्षत अर्पित कर। नारियल के ऊपर कुमकुम से स्वस्तिक बनाए और उन प्रत्येक स्वस्तिक के ऊपर पांच-पांच लौंग रखें और एक सुपारी रखें। माँ भगवती का ध्यान करें। माँ को प्रार्थना करें कष्टों की मुक्ति के लिए। कम्बल का आसन बिछा कर ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डाय विच्चे ॐ शैलपुत्री देव्यै नम:11 माला करें, तत्पश्चात नारियल सहित समस्त सामग्री को सफेद कपड़े में बांध कर अपने ऊपर से 11 बार वार कर सोने वाले पलंग के नीचे रख दें। सुबह ब्रह्म मुहूर्त में बिना किसी से बात किए यह सामग्री कुएं, तालाब या किसी बहते हुए पानी में प्रवाह कर दें। कानूनी कैसी भी समस्या होगी उससे छुटकारा मिल जाएगा।
* ऋण मुक्ति और धन वापसी के लिये किसी भी महीने के शुक्ल पक्ष के मंगलवार के दिन प्रदोष काल में यह पूजा प्रारंभ करें। किसी भी प्राण प्रतिष्ठित शिव मंदिर में जाकर श्रद्धापूर्वक शिव की उपासना करें। शिव पूजन के उपरांत अपने सामने दो दोने रख दें। एक दोने में यानी बायें हाथ वाले दोनें में 108 बिल्वपत्र पीले चंदन से प्रत्येक बिल्व पत्र में ॐ नम:शिवाय लिखकर रख दें। तत्पश्चात शुद्ध आसन बिछाकर एक बिल्वपत्र अपने दाहिनी हाथ में लें और इस ॐ ऋणमुक्तेश्वर महादेवाय नम:। मंत्र का जाप करें। और दाहिने हाथ वाले दोने में बिल्व पत्र को रख दें। ऐसा 108 बार करें। जाप पूरा होने के उपरांत एक पाठ ऋणमोचन मंगल स्तोत्र का करें। साथ ही सर्वारिष्ट शान्त्यर्थ शनि स्तोत्र का पांच पाठ भी करें। ऐसा नियमित 40 दिन तक पूजा करने से ऋण से छुटकारा मिल जाएगा।
* आप अपने कारोबार में कर्जे से डूबे जा रहे है रात-दिन मेहनत करने के उपरांत भी कर्जा उतरने का नाम ही नहीं ले रहा है तो यह प्रयोग आपके लिये बहुत ही अनुकूल व फायदेमंद रहेगा। किसी भी माह के शुक्ल पक्ष के प्रथमा के दिन नित्यक्रम से निवृत्त होकर स्नानोपंरात स्वच्छ वस्त्र धारण करें और अपने पूजा स्थान में यह पूजा प्रारंभ करें। 6 इंच लम्बी गूलर की पेड़ की जड़ ले उसके ऊपर 108 बार काले रंग का धागा ॐ गं गणपतये नम:मंत्र का जाप करते हुये लपेटे। भगवान गणेश जी से ऋण मुक्ति की प्रार्थना करें। 108 चक्र होने के बाद इस लकड़ी को स्वच्छ थाली में पीला वस्त्र बिछाकर रख दें। तत्पश्चात श्रद्धानुसार धूप,दीप, नैवद्य, पुष्प अर्पित करें। घी का दीपक प्रज्जवलित कर उसमें एक इलायची डाल दें। शुद्ध आसन बिछाकर अपने सामने हल्दी से रंगे हुये अक्षत रख लें। अपने हाथ में थोड़े से अक्षत लें ॐ गं गणपतये ऋण हरताये नम:मंत्र का जाप करके अक्षत गूलर की लकड़ी के ऊपर छोड़ दे। ऐसा 108 बार करें। अगले दिन यह प्रक्रिया पुन:दोहरायें। ऐसा नवमी तक पूजन करें। नवमी के दिन रात में सवा ग्यारह बजे पुन:एक बार पूजन करें। ऋण हरता गणपति की 11 माला जाप करें। तत्पश्चात इस लकड़ी को अपने ऊपर से 11 बार उसार कर के अपने घर के किसी कोने में गड्डा खेंद कर दबा दे। उसके ऊपर कोई भारी वस्तु रख दें। ऐसा करने से कर्ज से छुटकारा मिल जायेगा।
* किसी भी महीने के शुक्ल पक्ष के प्रथम मंगलवार के दिन गेहूं के सवा किलो आटा में सवा किलो गुड़ मिलाकर उसके गुलगुले या पूएं बनाएं। शाम के समय हनुमान जी को चमेली के तेल में सिंदूर घोलकर अभिषेक करने के उपरांत घी का दीपक जलाएं और वहीं बैठकर हनुमान चालीसा के 7 पाठ करें। तत्पश्चात हनुमान जी को इन गुलगुले और पूएं का भोग लगाएं और गरीब व जरूरतमंद व्यक्तियों को बांट दें। ऐसा 11 मंगलवार करें, ऋण से छुटकारा मिलेगा।
* ऋण मुक्ति के लिए उपाय सर्वप्रथम पांच गुलाब के फूल लाएं। ध्यान रहे कि उनकी पंखुड़ी टूटी हुई न हो। तत्पश्चात सवा मीटर सफेद कपड़ा, सामने रचो कर बिछाएं और गुलाब के वार फूलों को चारों कोनों पर बांध दें। फिर पांचवा गुलाब मध्य में डालकर गांठ लगा दें। इसे गंगा, यमुन और सरस्वती नदियों में प्रभावित करें। प्रभुकृपा से ऋण मुक्ति और घर में सुख समृध्दि की प्राप्ति होती है।
* व्यवसायिक परेशानी हल के लिये दीवाली के दिन नित्यकर्म से निवृत होकर स्नानोपरांत अपने पूजा स्थान में लक्ष्मी बीसा यंत्र एवं कुबेर यंत्र की श्रद्धापर्वूक स्थापना करने के उपरांत धूप, दीप, नैवेद्य, पुष्प और अक्षत से पंचोपचार पूजन करें। तत्पश्चात शुद्ध आसन बिछाकर स्फटिक की माला पर 11 माला इस ॐ यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धन धान्यादि पताये धन धान्य समृद्धि में देही दापय दापय स्वाहा मंत्र की जाप करें। संपूर्ण व्यावसायिक परेशानियों का निवारण होगा। हर रोज इस मंत्र की सुबह-शाम एक माला जाप करने से अवश्य धन में वृद्धि होगी।
* व्यापार में घाटा हो रहा हो या काम नहीं चल पा रहा हो, तो आप एक चुटकी आटा लेकर रविवार के दिन व्यापार स्थल या अपनी दुकान के मुख्य द्वार के दोनों ओर थोड़ा-थोड़ा छिड़क दें, साथ में कहें- जिसकी नजर लगी है उसको लग जाये। बुरी नजर वाले तेरा मुंह काला। यह क्रिया शुक्ल पक्ष में ही करें। संभव हो तो प्रयत्न करें कि इस क्रिया को करते हुए आपको कोई न देखे। गुप्त रूप से यह क्रिया करने पर व्यापार का घाटा दूर होने लगता है। इसके अलावा व्यापार स्थल में मकडिय़ों के जाले व्यापार की वृद्घि को रोकते हैं। अत: व्यापार में बरकत के लिए प्रत्येक शनिवार को दुकान की सफाई आदि करते समय मकड़ी के जालों को अवश्य हटा देना चाहिए।
* जिन उद्योगपतियों या व्यापारियों को काफी प्रयास और अथक परिश्रम करने के बावजूद बिक्री में वृध्दि नहीं हो पा रहा हो तो यह उपाय शुक्ल पक्ष में गुरुवार से प्रारम्भ करें और प्रत्येक गुरुवार को इस क्रिया को दोहराते रहें। घर के मुख्य द्वार के एक कोने को गंगाजल से शुध्द कर लें या धो लें। शुध्द किए गए स्थान पर स्वस्तिक का चिह्न बनाएं और उस पर थोड़ा दाल और गुड़ रख दें। साथ ही एक घी का दीपक जला दें। ध्यान रहे कि स्वस्तिक का चिह्न हल्दी से ही बनाएं। स्वास्तिक बनाने के बाद उसको बार-बार नहीं देखना चाहिए। यह उपाय बहुत ही सरल है और इसका प्रभाव शीघ्र ही परिलक्षित होने लगता है।
* कारोबार में वृद्धि हेतु ही हर रोज प्रात:काल नित्यकर्म से निवृत्त होकर स्नानोपरांत तांबे के लोटे में जल भरकर उसमें थोड़ी सी रोली डालकर ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय नम:॥ मंत्र का जाप करते हुए तुलसी के पौधे में जल चढ़ाएं। शाम को गाय के शुद्ध देसी घी का दीपक जलांए और इसी मंत्र की पांच माला जाप करें।
* कठिन परिश्रम व मेहनत करने के उपरांत लाभ की प्राप्ति नहीं हो रही हो तो प्रत्येक गुरुवार के दिन शुभ घड़ी में पीले कपड़े में 9 जोड़े चने की दाल, 9 पीले गोपी चंदन की डलियां, 9 गोमती चक्र इन सबको पोटली बनाकर किसी भी मंदिर में केले के पेड़ के ऊपर शाम के समय टांग दें। साथ ही एक घी का दीपक भी प्रज्ज्वलित कर लें। ऐसा 11 गुरुवार करने से धन की प्राप्ति होगी और व्यवसायिक समस्याओं का निवारण भी होगा।
* धन न रूक रहा हो तो किसी भी माह के शुक्ल पक्ष के प्रथम बुधवार के दिन 1 तांबे का सिक्का, 6 लाल गुंजा लाल कपड़े में बांधकर प्रात: 11 बजे से लेकर 1 बजे के बीच में किसी सुनसान जगह में अपने ऊपर से 11 बार उसार कर 11 इंच गहरा गङ्ढा खोदकर उसमें दबा दें। ऐसा 11 बुधवार करें। दबाने वाली जगह हमेशा नई होनी चाहिए। इस प्रयोग से कारोबार में बरकत होगी, घर में धन रूकेगा।
* धन वृद्धि हेतु किसी भी गुरु पुष्य नक्षत्र के दिन प्रात:काल नित्यकर्म से निवृत होकर स्नानोपरांत शंख पुष्पी की जड़ अपने घर में लेकर आएं इस जड़ को गंगाजल से पवित्र कर दें। पवित्र करने के उपरांत चांदी की डिब्बी में पीले चावल भरकर उसके ऊपर रख दें। श्रद्धानुसार धूप, दीप, नेवैद्य, पुष्प, अक्षत अर्पित कर पंचोपचार पूजन करें। उसके बाद इस डिब्बी को अपनी तिजोरी में रख दें। धन में वृद्धि और कारोबारमें लाभ होगा। हर गुरु पुष्य के दिन शंख पुष्पी की जड़ व चांदी की डिब्बी बदल दें। पहले वाली बहते पानी में प्रवाह कर दें।
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