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Monday, October 22, 2012

बुरी नजर और टोने-टोटकों से यूं बचें

कभी-कभी ऐसा होता है कि आपके जीवन में सबकुछ अच्छा चल रहा होता है और अचानक से ही समय एकदम बदल जाता है। जिस काम में आप सफलता प्राप्त कर रहे थे, वहां से आपके काम बिगडऩा शुरू कर देते हैं। घर में अक्सर कोई बीमार रहता हो या इसी प्रकार अन्य कोई परेशानी जो दिखने में तो सामान्य होती है लेकिन इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं। ज्योतिष और शास्त्रों के अनुसार जब अचानक से आपका अच्छा समय बुरे समय में बदल जाता है तो ऐसी संभावनाएं हो सकती हैं कि आपको या आपके घर को किसी की बुरी नजर लग गई हो। कई बार किसी की सफलता और समृद्धि से जलने वाले लोग उन्हें क्षति पहुंचाने के लिए टोने-टोटके या तंत्र-मंत्र जैसी नकारात्मक शक्तियों का उपयोग करते हैं। इन नकारात्मक शक्तियों के प्रभाव से एकदम ही सबकुछ गड़बड़ हो जाता है। इस प्रकार की नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव खत्म करने के लिए एक सटीक उपाय है कि अपने घर में नियमित रूप से गौमूत्र का छिड़काव किया जाए। शास्त्रों के अनुसार गौमूत्र को पवित्र पदार्थ माना गया है और इसमें वातावरण में मौजूद सभी नकारात्मक शक्तियों को समाप्त करने की शक्ति होती है। ऐसा माना जाता है गाय में सभी देवी-देवताओं का वास होता है। अत: इससे प्राप्त होने वाली हर चीज बहुत ही पवित्र और पूजनीय है। किसी भी प्रकार के टोने-टोटके, तंत्र-मंत्र या बुरी नजर के प्रभाव से बचने के लिए गौमूत्र का उपयोग सर्वश्रेष्ठ उपाय है। यदि संभव हो तो प्रतिदिन थोड़ा-थोड़ा गौमूत्र पीने से भी लाभ प्राप्त होते हैं। इसके अलावा अपने आसपास का वातावरण सकारात्मक रखें। किसी प्रकार के नकारात्मक विचारों को अपने से दूर ही रखें और ऐसे लोगों से भी दूर रहें। प्रतिदिन नियमित रूप से हनुमान चालीसा का पाठ करें और प्रति मंगलवार-शनिवार को हनुमान मंदिर जाएं तथा सुंदरकांड या हनुमान चालीसा का पाठ करें। आप सभी प्रकार के टोने-टोटकों और बुरी नजर के प्रभाव से बचे रहेंगे।

नवरात्र में करें ये काम, मिलेगा पैसा और पूरी होगी हर इच्छा

तंत्र शास्त्र के अनुसार नवरात्रि में की गई तंत्र क्रिया व पूजन का विशेष व जल्दी ही फल मिलता है। नवरात्रि में प्रमुख रूप से मां दुर्गा की आराधना की जाती है। इनकी आराधना करने से गुप्त सिद्धियां प्राप्त होती हैं। यदि दिनों किए जाने वाले टोने-टोटके भी बहुत प्रभावशाली होते हैं, जिनके माध्यम से कोई भी मनोकामना पूर्ति कर सकता है। नवरात्रि में किए जाने वाले कुछ टोटके इस प्रकार हैं- 1- यदि लड़की के विवाह में बाधा आ रही है तो नवरात्रि में किसी भी दिन केले की जड़ थोड़ी काटकर ले आएं और इसे पीले कपड़े में बांधकर लड़की के गले में बांध दें। शीघ्र ही विवाह हो जाएगा। 2- पीपल के पत्ते पर राम लिखकर तथा कुछ मीठा रखकर हनुमान मंदिर में चढ़ाएं। इससे धन लाभ होने लगेगा। 3- यदि आपके बच्चे को अक्सर नजर लगती है तो नवरात्रि के दौरान हनुमानजी के मंदिर में जाकर हनुमानचालीसा का पाठ करें और दाहिने पैर का सिंदूर बच्चे के मस्तक पर लगाएं। बच्चे को नजर नहीं लगेगी। 4- नवरात्रि में भगवान शंकर को सुबह चावल तथा बिल्व पत्र चढ़ाएं। शीघ्र ही आपकी धन की इच्छा पूरी होगी। 5- यदि नौकरी नहीं मिल रही है तो भैरवजी के मंदिर जाकर प्रार्थना करें व नैवेद्य चढ़ाएं। इससे नौकरी से संबंधित आपकी सभी समस्याएं हल हो जाएंगी। 6- धन प्राप्ति के लिए नवरात्रि के दौरान लक्ष्मी-नारायण के मंदिर में जाकर खीर व मिश्री का प्रसाद चढ़ाएं 9 वर्ष तक की कन्याओं को उनकी पसंद का भोजन कराएं। हो सके तो उन्हें कुछ उपहार भी दें। इससे आपकी जल्दी ही धन लाभ होगा।

Sunday, January 15, 2012

कलियुग के ब्रह्मास्त्र 'काल भैरव'

कहा जाए कि संकटों, आपदाओं और भिन्न-भिन्न प्रकार की समस्याओं से त्रस्त कलियुग में भगवान भैरोंनाथ महाराज का स्मरण, पूजा-अर्चना ब्रह्मास्त्र हैं तो अतिश्योक्ति नहीं। तंत्राचार्यों का मानना है कि वेदों में जिस परम पुरुष का चित्रण रुद्र में हुआ, वह तंत्र शास्त्र के ग्रंथों में उस स्वरूप का वर्णन 'भैरव' के नाम से किया गया, जिसके भय से सूर्य एवं अग्नि तपते हैं। इंद्र-वायु और मृत्यु देवता अपने-अपने कामों में तत्पर हैं, वे परम शक्तिमान 'भैरव' ही हैं। भगवान शंकर के अवतारों में भैरव का अपना एक विशिष्ट महत्व है। तांत्रिक पद्धति में भैरव शब्द की निरूक्ति उनका विराट रूप प्रतिबिम्बित करती हैं। वामकेश्वर तंत्र की योगिनीहदयदीपिका टीका में अमृतानंद नाथ कहते हैं- 'विश्वस्य भरणाद् रमणाद् वमनात्‌ सृष्टि-स्थिति-संहारकारी परशिवो भैरवः।'
भ- से विश्व का भरण, र- से रमश, व- से वमन अर्थात सृष्टि को उत्पत्ति पालन और संहार करने वाले शिव ही भैरव हैं। तंत्रालोक की विवेक-टीका में भगवान शंकर के भैरव रूप को ही सृष्टि का संचालक बताया गया है।
श्री तंत्वनिधि नाम तंत्र-मंत्र में भैरव शब्द के तीन अक्षरों के ध्यान के उनके त्रिगुणात्मक स्वरूप को सुस्पष्ट परिचय मिलता है, क्योंकि ये तीनों शक्तियां उनके समाविष्ट हैं-
'भ' अक्षरवाली जो भैरव मूर्ति है वह श्यामला है, भद्रासन पर विराजमान है तथा उदय कालिक सूर्य के समान सिंदूरवर्णी उसकी कांति है। वह एक मुखी विग्रह अपने चारों हाथों में धनुष, बाण वर तथा अभय धारण किए हुए हैं।
'र' अक्षरवाली भैरव मूर्ति श्याम वर्ण हैं। उनके वस्त्र लाल हैं। सिंह पर आरूढ़ वह पंचमुखी देवी अपने आठ हाथों में खड्ग, खेट (मूसल), अंकुश, गदा, पाश, शूल, वर तथा अभय धारण किए हुए हैं।
'व' अक्षरवाली भैरवी शक्ति के आभूषण और नरवरफाटक के सामान श्वेत हैं। वह देवी समस्त लोकों का एकमात्र आश्रय है। विकसित कमल पुष्प उनका आसन है। वे चारों हाथों में क्रमशः दो कमल, वर एवं अभय धारण करती हैं।
स्कंदपुराण के काशी- खंड के 31वें अध्याय में उनके प्राकट्य की कथा है। गर्व से उन्मत ब्रह्माजी के पांचवें मस्तक को अपने बाएं हाथ के नखाग्र से काट देने पर जब भैरव ब्रह्म हत्या के भागी हो गए, तबसे भगवान शिव की प्रिय पुरी 'काशी' में आकर दोष मुक्त हुए।
ब्रह्मवैवत पुराण के प्रकृति खंडान्तर्गत दुर्गोपाख्यान में आठ पूज्य निर्दिष्ट हैं- महाभैरव, संहार भैरव, असितांग भैरव, रूरू भैरव, काल भैरव, क्रोध भैरव, ताम्रचूड भैरव, चंद्रचूड भैरव। लेकिन इसी पुराण के गणपति- खंड के 41वें अध्याय में अष्टभैरव के नामों में सात और आठ क्रमांक पर क्रमशः कपालभैरव तथा रूद्र भैरव का नामोल्लेख मिलता है। तंत्रसार में वर्णित आठ भैरव असितांग, रूरू, चंड, क्रोध, उन्मत्त, कपाली, भीषण संहार नाम वाले हैं।

भगवान भैरव की महिमा अनेक शास्त्रों में मिलती है।
भैरव जहाँ शिव के गण के रूप में जाने जाते हैं, वहीं वे दुर्गा के अनुचारी माने गए हैं। भैरव की सवारी कुत्ता है। चमेली फूल प्रिय होने के कारण उपासना में इसका विशेष महत्व है। साथ ही भैरव रात्रि के देवता माने जाते हैं और इनकी आराधना का खास समय भी मध्य रात्रि में 12 से 3 बजे का माना जाता है।
भैरव के नाम जप मात्र से मनुष्य को कई रोगों से मुक्ति मिलती है। वे संतान को लंबी उम्र प्रदान करते है। अगर आप भूत-प्रेत बाधा, तांत्रिक क्रियाओं से परेशान है, तो आप शनिवार या मंगलवार कभी भी अपने घर में भैरव पाठ का वाचन कराने से समस्त कष्टों और परेशानियों से मुक्त हो सकते हैं।
जन्मकुंडली में अगर आप मंगल ग्रह के दोषों से परेशान हैं तो भैरव की पूजा करके पत्रिका के दोषों का निवारण आसानी से कर सकते है। राहु केतु के उपायों के लिए भी इनका पूजन करना अच्छा माना जाता है। भैरव की पूजा में काली उड़द और उड़द से बने मिष्‍ठान्न इमरती, दही बड़े, दूध और मेवा का भोग लगाना लाभकारी है इससे भैरव प्रसन्न होते है।
भैरव की पूजा-अर्चना करने से परिवार में सुख-शांति, समृद्धि के साथ-साथ स्वास्थ्य की रक्षा भी होती है। तंत्र के ये जाने-माने महान देवता काशी के कोतवाल माने जाते हैं। भैरव तंत्रोक्त, बटुक भैरव कवच, काल भैरव स्तोत्र, बटुक भैरव ब्रह्म कवच आदि का नियमित पाठ करने से अपनी अनेक समस्याओं का निदान कर सकते हैं। भैरव कवच से असामायिक मृत्यु से बचा जा सकता है।
खास तौर पर कालभैरव अष्टमी पर भैरव के दर्शन करने से आपको अशुभ कर्मों से मुक्ति मिल सकती है। भारत भर में कई परिवारों में कुलदेवता के रूप में भैरव की पूजा करने का विधान हैं। वैसे तो आम आदमी, शनि, कालिका माँ और काल भैरव का नाम सुनते ही घबराने लगते हैं, ‍लेकिन सच्चे दिल से की गई इनकी आराधना आपके जीवन के रूप-रंग को बदल सकती है। ये सभी देवता आपको घबराने के लिए नहीं बल्कि आपको सुखी जीवन देने के लिए तत्पर रहते है बशर्ते आप सही रास्ते पर चलते रहे।
भैरव अपने भक्तों की सारी मनोकामनाएँ पूर्ण करके उनके कर्म सिद्धि को अपने आशीर्वाद से नवाजते है। भैरव उपासना जल्दी फल देने के साथ-साथ क्रूर ग्रहों के प्रभाव को समाप्त खत्म कर देती है। शनि या राहु से पीडि़त व्यक्ति अगर शनिवार और रविवार को काल भैरव के मंदिर में जाकर उनका दर्शन करें। तो उसके सारे कार्य सकुशल संपन्न हो जाते है। एक बार भगवान शिव के क्रोधित होने पर काल भैरव की उत्पत्ति हुई। काल भैरव ने ब्रह्माजी के उस मस्तक को अपने नाखून से काट दिया जिससे उन्होंने असमर्थता जताई। तब ब्रह्म हत्या को लेकर हुई आकाशवाणी के तहत ही भगवान काल भैरव काशी में स्थापित हो गए थे। मध्यप्रदेश के उज्जैन में भी कालभैरव के ऐतिहासिक मंदिर है, जो बहुत महत्व का है। पुरानी धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान कालभैरव को यह वरदान है कि भगवान शिव की पूजा से पहले उनकी पूजा होगी। इसलिए उज्जैन दर्शन के समय कालभैरव के मंदिर जाना अनिवार्य है। तभी महाकाल की पूजा का लाभ आपको मिल पाता है। इसी तरह उत्तर प्रदेश के वाराणसी में कालभैरव महाराज विराजमान हैं, जिन्हें काशी का कोतवाल कहा जाता है। विश्वेश्वरगंज स्थित उनके जागृत मंदिर में देश-विदेश से हजारों श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं। भैरव कलियुग के जागृत देवता हैं। शिव पुराण में भैरव को महादेव शंकर का पूर्ण रूप बताया गया है। इनकी आराधना में कठोर नियमों का विधान भी नहीं है। ऐसे परम कृपालु एवं शीघ्र फल देने वाले भैरवनाथ की शरण में जाने पर जीव का निश्चय ही उद्धार हो जाता है।
यूं तो भगवान भैरवनाथ को खुश करना बेहद आसान है लेकिन अगर वे रूठ जाएं तो मनाना बेहद मुश्किल। पेश है काल भैरव अष्टमी पर कुछ खास सरल उपाय जो निश्चित रूप से भैरव महाराज को प्रसन्न करेंगे :-
1. रविवार, बुधवार या गुरुवार के दिन एक रोटी लें। इस रोटी पर अपनी तर्जनी और मध्यमा अंगुली से तेल में डुबोकर लाइन खींचें। यह रोटी किसी भी दो रंग वाले कुत्ते को खाने को दीजिए। अगर कुत्ता यह रोटी खा लें तो समझिए आपको भैरव नाथ का आशीर्वाद मिल गया। अगर कुत्ता रोटी सूंघ कर आगे बढ़ जाए तो इस क्रम को जारी रखें लेकिन सिर्फ हफ्ते के इन्हीं तीन दिनों में (रविवार, बुधवार या गुरुवार)। यही तीन दिन भैरव नाथ के माने गए हैं।
2. उड़द के पकौड़े शनिवार की रात को कड़वे तेल में बनाएं और रात भर उन्हें ढंककर रखें। सुबह जल्दी उठकर प्रात: 6 से 7 के बीच बिना किसी से कुछ बोलें घर से निकले और रास्ते में मिलने वाले पहले कुत्ते को खिलाएं। याद रखें पकौड़े डालने के बाद कुत्ते को पलट कर ना देखें। यह प्रयोग सिर्फ रविवार के लिए हैं।
3. शनिवार के दिन शहर के किसी भी ऐसे भैरव नाथ जी का मंदिर खोजें जिन्हें लोगों ने पूजना लगभग छोड़ दिया हो। रविवार की सुबह सिंदूर, तेल, नारियल, पुए और जलेबी लेकर पहुंच जाएं। मन लगाकर उनकी पूजन करें। बाद में 5 से लेकर 7 साल तक के बटुकों यानी लड़कों को चने-चिरौंजी का प्रसाद बांट दें। साथ लाए जलेबी, नारियल, पुए आदि भी उन्हें बांटे। याद रखिए कि अपूज्य भैरव की पूजा से भैरवनाथ विशेष प्रसन्न होते हैं।
4. प्रति गुरुवार कुत्ते को गुड़ खिलाएं।
5. रेलवे स्टेशन पर जाकर किसी कोढ़ी, भिखारी को मदिरा की बोतल दान करें।
6. सवा किलो जलेबी बुधवार के दिन भैरव नाथ को चढ़ाएं और कुत्तों को खिलाएं।
7. शनिवार के दिन कड़वे तेल में पापड़, पकौड़े, पुए जैसे विविध पकवान तलें और रविवार को गरीब बस्ती में जाकर बांट दें।
8. रविवार या शुक्रवार को किसी भी भैरव मं‍दिर में गुलाब, चंदन और गुगल की खुशबूदार 33 अगरबत्ती जलाएं।
9. पांच नींबू, पांच गुरुवार तक भैरवजी को चढ़ाएं।
10. सवा सौ ग्राम काले तिल, सवा सौ ग्राम काले उड़द, सवा 11 रुपए, सवा मीटर काले कपड़े में पोटली बनाकर भैरव नाथ के मंदिर में बुधवार के दिन चढ़ाएं।
भैरव आराधना के चमत्कारिक मंत्र
जीवन में आने वाली समस्त प्रकार की बाधाओं को दूर करने के लिए भैरव आराधना का बहुत महत्व है। खास तौर भैरवाष्टमी के दिन तंत्र-मंत्रों का प्रयोग करके आप अपने व्यापार-व्यवसाय, जीवन में आने वाली कठिनाइयां, शत्रु पक्ष से आने वाली परेशानियां, विघ्न, बाधाएं, कोर्ट कचहरी आदि मुकदमे में जीत के लिए भैरव आराधना करेंगे, तो निश्चित ही आपके सारे कार्य सफल और सार्थक हो जाएंगे। मंत्र जप आपके समस्त शत्रुओं का नाश करके उन्हें भी आपके मित्र बना देंगे। आपके द्वारा सच्चे मन से की गई भैरव आराधना और मंत्र जप से आप स्वयं को जीवन में संतुष्ट और शांति का अनुभव करेंगे।
भैरव आराधना के खास मंत्र निम्नानुसार है:-
- 'ॐ कालभैरवाय नम:।'
- 2 ॐ भयहरणं च भैरव:।'
- 'ॐ ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाय कुरूकुरू बटुकाय ह्रीं।'
- 'ॐ हं षं नं गं कं सं खं महाकाल भैरवाय नम:।'
- 'ॐ भ्रां कालभैरवाय फट्‍।'

Friday, January 6, 2012

इंटरव्यू में सफलता का उपाय

इंटरव्यू का नाम सुनते ही अच्छे अच्छों के पसीने छूट जाते हैं। हर वक्त यही बात दिमाग में घुमती है कि इंटरव्यू में क्या प्रश्न पुछेंगे। उनका जबाव दे पाऊंगा या नहीं। इस तरह इंटरव्यू से पहले ही कई लोग नर्वस हो जाते हैं। यदि आप भी इंटरव्यू देने जा रहे हैं और उसमें सफलता चाहते हैं तो नीचे लिखा उपाय करें-
उपाय
शुभ दिन देखकर सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि करने के बाद सफेद रंग का सूती आसन बिछाकर पूर्व दिशा की ओर मुख करके उस पर बैठ जाएं। अब अपने सामने पीला कपड़ा बिछाकर उस पर 108 दानों वाली स्फटिक की माला रख दें और इस पर केसर व इत्र छिड़क कर इसका पूजन करें। इसके बाद धूप, दीप और अगरबत्ती दिखाकर नीचे लिखे मंत्र का 31 बार उच्चारण करें। इस प्रकार ग्यारह दिन तक करने से वह माला सिद्ध हो जाएगी। जब भी किसी इंटरव्यू में जाएं तो इस माला को पहन कर जाएं। ऐसे करने से शीघ्र ही इंटरव्यू में सफलता मिलेगी।
मंत्र
ऊँ ह्लीं वाग्वादिनी भगवती मम कार्य सिद्धि कुरु कुरु फट् स्वाहा।

Thursday, October 20, 2011

जल्दी बुखार उतारने का यंत्र

मौसम बदल रहा है, बुखार का मौसम है। बुखार भी कई तरह के होते है,कभी शारीरिक बुखार होता है,तो कभी दिमागी बुखार होता है,कभी पैसे का बुखार होता है,तो कभी रिस्तों का बुखार होता है,बुखार का मतलब केवल मलेरिया या टाइफ़ाइड से ही नही लेना चाहिये,सबसे खराब रिस्तों का बुखार होता है,इस बुखार में आदमी को दिन का चैन और रात की नींद नही मिल पाती है,पति को लवेरिया का बुखार आ गया तो मान लीजिये दुनिया के किसी हकीम और डाक्टर की हिम्मत नही है,कि वह उस बुखार को निकाल दे,इस यंत्र को किसी प्लेट में नीबू के रस से बनाकर उस प्लेट में हरी सलाद आदि रख कर किसी भी बुखार से पीडित व्यक्ति को दो चार दिन लगातार खिलाई जावे,तो उसका बुखार जल्दी उतर जायेगा.

परीक्षा में सफलता दिलाने वाला यंत्र

सालभर पूरी मेहनत से पढाई की जावे और जब परीक्षा हाल में बैठा जावे,तो आगे पीछे का सब कुछ भूलकर लिखा जाने वाला मैटर और पूंछे जाने वाले सवाल किसी का उत्तर नही दिया जावे,तो रिजल्ट तो वही होगा,जो सभी जानते है,यानी फ़ेल होना,समय भी खराब हुआ,धन भी बेकार हुआ,और साथ वालों के साथ पीछे रह जाने से बदनामी भी मिली,अक्सर ग्रहों के द्वारा जब काफ़ी खोजबीन की गयी तो एक बात का पता चला कि राहु की दशा या अन्तर्दशा में अक्समात सब कुछ खत्म हो जाता है,आदमी की सभी चालाकियां शंका के रहते या तो बिलकुल खत्म हो जाती है,या फ़िर वह सही को गलत और गलत को सही कहने लगता है,आजकल आब्जेक्टिव-टाइप सवाल होने से टिकमार्का लगाते वक्त दिमाग एक दम घूम जाता है,और जो सोच कर लिखना होता है,उसे अक्समात बिना किसी सोच समझ के लिख दिया जाता है,इस यंत्र को धारण करने के बाद अधिकतर मामलों में सफ़लता मिलती देखी गयी है,लाल कागज पर लाल चन्दन से लिख कर इस यंत्र को सौंफ़ और शक्कर के साथ किसी लाल रंग की पालीथीन में रखकर और लाल रंग के कपडे में बान्ध कर या चांदी के ताबीज में भरकर पुरुष अपनी दाहिनी भुजा पर और महिलायें अपनी बायीं भुजा पर बान्ध लें,साथ ही किसी प्रकार अम्ल या गुटका,तम्बाकू,बीडी सिगरेट शराब या कोई नशे की गोली आदि ली जा रही हो तो फ़ौरन उसे त्याग कर हनुमानजी का पाठ या किसी प्रकार से धार्मिक कार्यों में मन लगाना चाहिये,परीक्षा में पास होने या इन्टर्व्यू में सफ़लता के बाद दस गरीबों को भोजन खिलाने से पूरा असर जिन्दगी भर रहता है.

Wednesday, August 24, 2011

भागो मत, सामना करने से दूर होगा भय

भैरव तंत्र के अनुसार किसी चीज का अतिक्रमण उसी चीज के माध्यम से संभव है। उदाहरण के लिए, भय है तो भय से भागकर या बचकर नहीं भय का सामना करने से ही भय का निवारण हो पाएगा। माँस, मदिरा, मत्स्य, काम की चाह जल्दी भरमाते हैं। इनसे से बचना है तो इनका अतिक्रमण करना होगा। बीच से गुजर कर जाना होगा। जब आप इन्हें देख लेंगे, इन्हें जान लेंगे तो फिर ये आपको भरमा नहीं पायेंगे। ये आकर्षण इसीलिये भरम पैदा करते हैं कि लोग सोये सोये ही इनमें उलझे रहते हैं। जिस दिन जागकर इन्हें जान लिया उसी दिन से इन आकर्षणों का अर्थ समाप्त हो जाता है। ये आकर्षण अर्थहीन हो जाते हैं। ये आकर्षित करना छोड़ देते हैं। भैरव तंत्र ने अनेक उपाय सुझाये हैं। ये सारे उपाय बाजार की उन्हीं गलियों से गुजरते हैं जहाँ आपका आपा खो गया था। उदाहरण के लिए कुछ रास्तों के नाम हैं – मायीव प्रयोग (फ़िल्म, जादू के करतब, तमाशा आदि), भोजन, पान, मित्र – मिलाप, प्रेम – प्रसंग, गाड़ी की सवारी, संगीत सुनते समय आदि। भैरव तंत्र कहता है कि ये ही रास्ते आपको भैरवी अवस्था तक पहुँचा सकते हैं जहाँ पातँजलि आपको अष्टाँग योग से ले जाना चाहते हैं। भैरव तंत्र के रास्ते से लाभ यह होगा कि आपको बाजार भी नहीं त्यागना पड़ेगा और आप बाजार में योग की दुकान सजाये बैठे आढ़तियों से भी बच जाएँगे।
भैरव तंत्र के प्रारम्भ में ही देवी शिव से पूछती हैं- हे शिव, आपका सत्य क्या है? यह विस्मय भरा विश्व क्या है? इसका बीज क्या है? विश्व चक्र की धुरी क्या है? रूपों पर छाए लेकिन रूप के परे जाकर हम इसमें कैसे पूर्णतः प्रवेश करें? मेरे संशय निर्मूल करें। इसके उत्तर में शिव ने देवी के समक्ष 112 विधियों का उल्लेख किया है जिनके माध्यम से भैरवी अवस्था को प्राप्त हुआ जा सकता है। इन 112 विधियों की चर्चा से पूर्व भैरवी अवस्था को समझना श्रेयस्कर होगा। विज्ञान भैरव की14 वीं,15 और 19 वीं कारिकाओं में शिव कहते हैं –
दिक्कालकलनोन्मुक्ता देशोद्देशाविशेषिणी।
व्युपदेष्टुमशक्यासावकथ्या परमार्थतः।।14।।
अन्तः स्वानुभवानन्दा विकल्पोन्मुक्त गोचरा।
यावस्था भरिताकारा भैरवी भैरवात्मनः।।15।।
न वह्नेर्दाहिका शक्तिव् र्यतिरिक्ता विभाव्यते।
केवलं ज्ञानसत्तायां प्रारम्भोदयं प्रवेशने।।19।।

अर्थात दिशा और काल के व्यापार से मुक्त, दूर या समीप के भेद से रहित, प्रतिपादन के अयोग्य यह तत्त्वतः अनिर्वचनीय है। वास्तव में भीतर ही भीतर अपने अनुभव मात्र से आनन्द देने वाली और संकल्प विकल्प से मुक्त होकर अनुभूत होने वाली जो परिपूर्ण आकार वाली अवस्था है वही भैरवी शक्ति है। अग्नि की दाह्य शक्ति अग्नि से अलग कुछ नहीं है। ज्ञान प्रारम्भ करने के लिए प्रवेश द्वार के रूप तक तो ठीक है। शिव यहाँ अस्तित्त्व और ज्ञान के द्वैत को समझा रहे हैं। उनके अनुसार ज्ञान और अस्तित्त्व अनिवार्यतः एक ही नहीं हैं। ज्ञान एक कामचलाऊ अवधारणा भर है। ज्ञान मात्र से अस्तित्त्व के बारे में दिया गया वक्तव्य बहुत प्रमाणिक नहीं हो सकता है। विषय में प्रवेश करवा देने के बाद ज्ञान का मूल्य रद्दी के गट्ठर से अधिक शायद ही रह पाता हो। 32 वीं कारिका कहती हैः
शिखिपक्षैश्चित्ररूपैर्मण्डलैः शून्यपंचकम्।
ध्यायतोनुत्तरे शून्ये प्रवेशो हृदये भवेत्।।32।।

रंगीन मोरपंखों की तरह मण्डलों (इन्द्रियों या तन्मात्राओं) को पंचक शून्य मानकर हृदय में ध्यान करते हुए (योगी) का प्रवेश अनुत्तर शून्य में होता है। मोर पंखों में रंगीन वर्तुल होते हैं। मोहक होते हैं। मनभावन होते हैं। आपकी पाँच इन्द्रियाँ ( आँख, नाक, कान, रसना और त्वचा) हैं और इन पाँच इन्द्रियों से सम्बन्धित पाँच तन्मात्राएँ ( रूप, गंध, शब्द, रस और स्पर्श ) हैं। इनमें ही स्थित हो जाओ। इनसे भागो मत। इनमें स्थित हो जाओ। इन से भाग कर आप जा नहीं पाएँगे। इनसे भागने का कोई उपाय नहीं है। जहाँ भी भाग कर जाओगे आपके आँख, नाक, कान, जीभ और खाल वहीं वहीं चली जाएगी। आप इन इन्द्रियों के बिना भाग ना पाओगे। ये आपके अटूट हिस्से हैं। इनमें स्थित हो जाओ। इन्हीं में विसर्जित हो जाओ। शिव कहते हैं – ऐसे नहीं। आप खा रहे हैं। हाथ, जबड़ा, जीभ, कान, मस्तिष्क सब चल रहे हैं। भोजन किया जा रहा है। आपकी इन्द्रियाँ गतिशील हैं परन्तु आप किसी भी इन्द्रिय की गति में उपस्थित नहीं हैं। मुँह, आँख, कान, मस्तिष्क चलाने वाला सोया हुआ है। इन्द्रियाँ आपके अस्तित्त्व का हिस्सा हैं। जब देखो तो देखना बन जाओ। सुनो तो सुनना बन जाओ। जागकर देखो कि देखा जा रहा है। जागकर सुनो कि सुना जा रहा है। जाग कर सूँघो कि सूँघा जा रहा है। शिव जागरण का आह्वान कर रहे हैं। शिव कहते हैं- जागकर अपनी इन्द्रियों के मण्डल में खो जाओ। सोते हुए मत देखो। सोते हुए मत सुनो। सोते हुए देखोगे तो दृश्य तो रहेगा पर दर्शक का स्थान खो जाएगा। दर्शक के होने का कोई उपाय न बचेगा। शिव कहते दृश्य यन्त्रवत् है, दर्शक नहीं। दर्शक चेतन हैं। शिव दर्शक को जगाते हैं। शिव चैतन्य की बात करते हैं। रंगीन मोरपंखों की तरह मण्डलों (इन्द्रियों या तन्मात्राओं) को पंचक शून्य मानो। मोर पंखों की तरह इन पंचेन्द्रियों या पंच तन्मात्राओं को शून्य मानो। आरोपण मत करो। आरोपण से दृश्य शुद्ध नहीं रह पाएगा। आरोपण एक बाधा है। यह कृत्रिम है। यह दृश्य की सही संवेदना को दर्शक तक पहुँचने से रोकती है। जो संवेदना विषय से चलनी शुरु हुई थी वह जस की तस चित्त तक नहीं पहुँची। पुराने अनुभवों के आरोप ने उसे मैला कर दिया। दर्शक को जो दृश्य उपस्थित हो सकता था पिछले अनुभवों के आरोप ने उसे उस दृश्य से वंचित कर दिया। अब इसके बाद हृदय में ध्यान करने से योगी शून्य में प्रवेश करता है। हृदय में ध्यान की विशिष्टता है। भ्रूमध्य में नहीं, मूलाधार में नहीं, मध्यनाड़ी में नहीं, शिव कहते हैं – हृदय में ध्यान करने से योगी शून्य में प्रवेश करता है। इससे पूर्व में 24 वीं कारिका में शिव कहते हैं कि हृदय से द्वादशांत तक चलने वाली ऊर्ध्व वायु प्राण है और द्वादशाँत से हृदय तक चलने वाली अधो वायु अपान है। शिव कहते हैं कि हृदय प्राण की उत्पत्ति का स्थान है। यहाँ प्राण और अपान का मिलन होता है। हृदय अस्तित्त्व का आधार स्थान है। हृदय में ध्यान करने से योगी शून्य में प्रवेश करता है। मस्तिष्क बुद्धि का उपकरण है। मस्तिष्क सोचने विचारने की टूल किट है। बुद्धि सोचने और विचारने के बाद संकल्प और विकल्प सुझा देती है। बुद्धि विकल्पात्मिका है। योगी शून्य में प्रवेश करता है। नागसेन बहुत बड़े बौद्ध आचार्य हुए हैं। एक बार राजा मिलिन्द ने उनसे पूछा था – भन्ते कुछ लोग कहते हैं कि संसार है, कुछ अन्य लोग कहते हैं कि संसार नहीं है बस प्रतीति है। कुछ लोग कहते हैं कि संसार ऐसा है तो अन्य लोग संसार को कुछ अन्य तरह का बताते हैं। ऐसी ही बातें आत्मा, ईश्वर आदि के बारे में भी कही जाती हैं। भगवन कृपया मेरी शंका का निवारण करें। मुझे इनका स्वरूप बतायें । नागसेन ने कहा – राजन् , संसार का अस्तित्त्व है – ऐसा कहना नितांत सही नहीं होगा। क्योंकि अगर संसार का अस्तित्त्व है तो मृत्यु जैसी अनस्तित्त्वमूलक घटनाओं का कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया जा सकता है। जिसका अस्तित्त्व है उसका अनस्तित्त्व नहीं हो सकता। राजन ऐसा भी नहीं कहा जा सकता कि संसार का कोई अस्तित्त्व नहीं है। नियमित रूप से जन्म आदि घटनाएँ देखने में आती हैं। अनस्तित्त्वमान संसार का नियमित रूप से अस्तित्त्व में आते रहने को समझाया नहीं जा सकता है। साथ ही ऐसा भी कहना युक्तिसंगत नहीं है कि यह अनस्तित्त्वमान सत्ताओं का अस्तित्त्व है या अस्तित्त्वमान सत्ताओं का अनस्तित्त्व है। अन्तिम दोनों स्थितियाँ स्वतः व्याघाती (self contradictory) हैं। तब राजा मिलिन्द ने फिर पूछा कि प्रभु तब यह सब क्या है. नागसेन ने कहा- राजन यह अनिर्वचनीय है। इसे बोलकर नहीं बताया जा सकता है। आप संसार से कट कर कहीं नहीं जा सकते। संसार से कटना कोई मार्ग है भी नहीं। यहीं मुक्त हो जाओ। मोक्ष पा जाओ। कन्दराओं में मोक्ष होता तो वहाँ की शिलाँए पहले ही मोक्ष पा चुकी होतीं। आपके जाने के लिए स्थान न बचता। मोक्ष कन्दराओं में नहीं छिपा है। मोक्ष आपमें ही छिपा है। अपितु आप ही मोक्ष हैं। बिलकुल वैसे ही जैसे की आप ही बन्धन भी हैं। मोक्ष बाहर से आयातित कोई वस्तु नहीं है। आपकी जागृति ही है। जाग जाओ, यह जरूरी है।